हरियाणा से 38 डाक कांवड़िया की टीम गांगोत्री से हरियाणा जा रही थी,
जिनमें से ट्रक में 14 सवार थे।
अन्य 24 कांवड़िया बाईक से/पैदल जल लेके चल रहे है।
घटना में सिरियस कोई नही हैं, सभी की स्थिति खतरे से बाहर हैं।
ट्रक पलटने से 14 में से 10 घायल हुए।
04 घायल जिला अस्पताल बौराड़ी।
06 सी यच सी कमांद।
अन्य 04 को मौके पर फर्स्ट एड दिया गया।
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[06/06, 10:37 pm] Virsnsari: 🔭साइंटिफिक-एनालिसिस🔬
भारतीय मीडीया को संवैधानिक चेहरा मिलने का लोकतांत्रिक तरिका…
जुबानी तौर पर सिर्फ बोले जाना वाला लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया न तो धरातल पर मूर्तरूप से हैं और न इसकी कोई प्रक्रिया और व्यवस्था हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करे व उसे समय के बढ़ते चक्र के साथ विघटन से बचाकर स्थाईत्व प्रदान करें | आपके साइंटिफिक-एनालिसिस द्वारा राष्ट्रपति को वर्ष 2011 में ही सांकेतिक रूप से उनके संवैधानिक पद की गरिमा को व्याखित करने के प्रारूप में यह सच सामने आ गया और दुनिया में पहली बार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के ग्राफिक्स रूप का उद्भव हो गया | इसके लिए प्रमाणित दस्तावेज हमारे आविष्कार को देश व दुनियाभर से मिले समर्थन के कागजों के रूप में महामहिम राष्ट्रपति तक पहुंचे | यह बात अब दिन दुगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से हर मीडियाकर्मी और देश के नागरिकों तक पहुंच रही हैं |
अब बात आती हैं कि मीडीया को यह संवैधानिक चेहरा व जवाबदेही वाला कानूनी अधिकार मिलेगा कैसे? जो आंदोलनों, तोड़फोड़, सविनय अवज्ञा विरोध, भारत बंद, विरोध-प्रदर्शनों, अहिंसक पैदल मार्च आदि से जनता को परेशान किये बिना, किसी व्यक्ति आधारित सर्वेसर्वा राजनैतिक दल व किसी बड़े राजनैतिक दल के बड़े राजनेता के चरणों में लेटे बिना और पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े गिने-चुने व्यक्तियों को नेता बना या गरीब, कमजोर, निचले स्तर के पत्रकारों को बलि के बकरे के रूप में बलिदान कराये बिना वर्तमान में चल रही संवैधानिक प्रक्रिया के तहत शांति, सौहाद्र, एकता, भाईचारे और बुद्धिमता से पूरा हो जाये |
मीडीया का संवैधानिक चेहरा हर पत्रकार के लिए जरूरी हैं क्योंकि उसके पेशे के साथ सामाजिक रूप से आन-बान-शान और जीवन की सुरक्षा एवं स्थाईत्व से जुडा़ हैं | इसमें राष्ट्र निर्माण करने की भूमिका, आपराधिक एवं बाहुबली लोगों की सच्चाई उजागर करने पर उनसे सुरक्षा, कार्य के दौैरान कोई दुर्घटना व अप्रिय घटना हो जाने, जीवनपर्यंत कार्य के बाद पेंशन, असमय चले जाने पर परिवार को संरक्षण, सच्चाई, निष्ठा व ईमानदारी वाले कार्य को पहचान, सम्मान और पत्रकारिता के कार्यक्षेत्र में शीर्ष पद पर जाने तक की प्रक्रिया, सच सामने लाने पर फर्जी / गलत व परेशान और दबाव बनाने के लिए करी जाने वाली एफ.आई.आर. और अदालती मुकदमें, आर्थिक रूप से सहयोग/आश्ररा ताकि धनबल के आगे घुटने न टेकने पड़े, आजकल बिक चुके बिना अक्कल वालों के झूंड द्वारा सोशियल मीडिया में झूठी जानकारी, छेड़छाड़ व गढी हुई तस्वीरें व वायरल के माध्यम से मानसिक उत्पीड़न से बचाव इत्यादि-इत्यादि मामले व दृष्टिकोण हैं |
इतना सबकुछ होने के बाद भी पत्रकारों से ज्यादा लोकतंत्र को बिखराव, बर्बाद होने व स्थाईत्व के लिए मीडिया के संवैधानिक चेहरे की जरूरत ज्यादा हैं व व्यवस्था के विकेन्द्रीयकरण एवं आगे की दिशा में अग्रसर बनाये रखने के लिए जवाबदेही वाले कानूनी अधिकार को तुरन्त प्रभाव से देना अति आवश्यक है | हेट-स्पीच, अश्लीलता, फेंक-न्यूज, वायरल संदेश, झूठ के गुब्बार बनाकर ठगी, लूट-खसोट, भीडतंत्र बनाकर व फर्जी जनसमूह से माइंडवाश, व्यवसाहिकरण के जकड़न और बाजारवाद के फंदे, धनबल से गुलामीता, कानूनी प्रक्रिया के नाम पर टार्चर और वसूली, मान-मर्यादा व ईज्जत के नाम पर शारीरिक, लैंगिक शोषण और सामाजिक जीवन की बर्बादी जैसे कई हथकंडे बड़ी तेजी से पत्रकारिता व व्यवस्था को निगल रहे हैं |
पत्रकार लोग संगठित होकर अपना संवैधानिक चेहरा ले लेंगे यह मुश्किल लगता हैं क्योंकि गोदी मीडिया का भस्मासुर राजनैतिक रूप से इनमें घुस चुका हैं जो लालच, घृणा, चाटुकारिता, स्वार्थ, अहंकार, घमण्ड, श्रेत्र-विशेष, धार्मिक संकीर्णता व अब जातिवाद के जहर से लबरेज हैं | हमारी आविष्कार की फाईल प्रधानमंत्री कार्यालय से राष्ट्रपति के पास अंतिम निर्णय के लिए पहुंच चुकी हैं व कई मंत्रालयों की एक संकलित रिपोर्ट बन चुकी हैं इसलिए कार्यपालिका अब कुछ नहीं कर सकती | विधायिका यानि संसद में कानून बनने के बाद अंतिम स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास जाता हैं | यह मामला पहले ही राष्ट्रपति के पास पहुंच गया हैं इसलिए संसद कुछ नहीं कर सकती | यदि राष्ट्रपति इसे संसद के पास भेज मीडिया के संवैधानिक चेहरे का गठन व जवाबदेही कानूनी आधिकार देने का कानून बनाने को कहें तो अलग बात हैं | यदि सभी सांसदगण अलग प्रक्रिया प्रारम्भ सै शुरु कर दो तिहाई बहुमत से पास कर राष्ट्रपति को भेजे तो बात अलग हैं।
उच्चतम स्तर यानि न्यायपालिका सभी हेट-स्पीच के मामले में प्रचार प्रसार के माध्यम मीडिया व उसकी जानकारी में आ चुके संवैधानिक चेहरा न होने की सच्चाई को देखकर इस पर अलग से संविधान पीठ में सुनवाई कर राष्ट्रपति को मंजूरी के लिए भेज दे | यदि संवैधानिक पीठ में सभी 15 न्यायाधीश मौजूद हो तो इसे राष्ट्रपति भी नहीं बदल सकते व रोक सकते हैं | राष्ट्रपति हमारी विचाराधीन आविष्कार की फाईल पर अंतिम निर्णय के लिए अधिकृत होने के कारण स्वयं फैसला ले ले | यदि उन्हें शंशय हो या गलत परम्परा शुरु हो जाने का डर हो तो संविधान के भाग 5 में अनुच्छेद 143 की शक्ति का इस्तेमाल करते हुए उसे मुख्य न्यायाधीश को भेज सं वह पीठ के माध्यम से सलाह मांगकर फैसला सुना दे |
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[19/07, 3:50 pm] Virsnsari: साइंटिफिक-एनालिसिस
राष्ट्रपति की संवैधानिक लंगडी कुर्सी ने भारत की जग हसाई करवाई
भारत के लोकतन्त्र में सर्वोच्य पद राष्ट्रपति का होता हैं | यह संवैधानिक कुर्सी लंगडी है | इसके तीन पाये ही हैं, चौथा पाया नहीं हैं | महामहिम राष्ट्रपति को इसकी जानकारी पहले ही भेजी जा चुकी हैं व इसको विस्तार से परिभाषित करा हुआ साइंटिफिक-एनालिसिस भी आधिकारिक रूप से भेजा जा चुका हैं | हमारे आविष्कार असली एडी-सिरिंज पर अन्तिम फैसला लेने के लिए अधिकृत राष्ट्रपति की उसी फाईल में यह कटु सत्य प्रमाण सहित प्रस्तुत कर रखा हैं |
सर्वोच्य संवैधानिक राष्ट्रपति की कुर्सी जो भारत के लोकतन्त्र पर शीर्ष पर है उसका एक पाया न्यायपालिका हैं जो उच्चतम न्यायालय के शीर्ष रूप से जुडा हैं | इसका दुसरा पाया विधायिका का हैं जो संसद के शीर्ष रूप से जुडा हैं | तिसरा पाया कार्यपालिका हैं जो प्रधानमंत्री कार्यालय के शीर्ष से जुडा हैं | इसका चौथा पाया हैं ही नहीं | मीडीया को जुबानी तौर पर लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं परन्तु इसको कोई शीर्ष केन्द्र नहीं दे रखा हैं, जिसके प्रमुख को भी राष्ट्रपति शपथ दिलाकर सीधे अपने से जोड सके | आपको यहां स्पष्ट कर दूं कि राष्ट्रपति की कुर्सी का यहा तात्पर्य संविधान में दी हुई शक्तियां व संवैधानिक पदों में उसका क्रम हैं | इस कुर्सी पर कौन बैठा हैं उसका कोई मतलब नहीं हैं, वैसे भी इस कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति का निजी जीवन मानने से संविधान की विशेष छूट हैं |
आपरेशन सिंदूर के दौहरान मीडिया के कई न्यूज चैनलो ने गलत, भ्रामक व फर्जी खबरे चलाई जिससे पुरी दुनिया में भारत व भारत की सेना जिसकी प्रमुख राष्ट्रपति हैं उसकी बुरी फजीहत हुई जो इतिहास पर कालिख के रूप में चस्पा हो गई | सेना के अधिकारीयों को प्रेस-कान्फ्रेन्स कर कर के सच सामने रखना पडा | विदेश में कई प्रतिष्ठित अखबारों ने एक नहीं कई न्यूज चैनलो की खबरों को एक साथ जोडकर पुरे भारत की खिल्ली उडाई | यदि मीडिया का चौथा स्तम्भ सीधा जुडा होता तो राष्ट्रपति भवन के माध्यम से उन्हें जो सीधी खबर मीलती उसे ही प्राथमिकता देनी पडती |
आपरेशन सिंदूर से पहले कार्यपालिका को मीडिया के लिए गाईडलाइन जारी करनी पड रही थी कि वो सेना की आवाजाही व सामरिक जगहों की खबरें, फोटो व वीडियो न चलाये | यह सिर्फ गाईडलाइन ही थी इस कारण कोई चैनल, अखबार, पत्रिका, बेबसाइट, आनलाईन न्यूज पोर्टल व सोशियल मीडीया पर बता भी दे तो बाद में उसकी जांच करकर सजा ही दी जा सकती है। इतने समय में तो भारत व सेना को बडा खामियाजा भुगतना पड सकता हैं | आपरेशन सिंदूर में यह खामियाजा कम था इसलिए चल गया अन्यथा सीधी व आर-पार की लडाई में देश की हार व हजारों सैनिकों की मौत का खतरा बन सकती हैं |
यदि राष्ट्रपति की कुर्सी लंगडी नहीं होती तो वो सीधा मीडिया के शीर्ष प्रमुख को सीधा आदेश देकर सबकुछ पहले ही रूकवा देती ताकि लाईव टेलिकास्ट में भी उसका पालन हो सकता | आपरेशन सिंदूर के साथ भारतीय सेना लगातार अपनी खामियों को सुधार रही हैं इसलिए भारतीय सेना की सर्वोच्च लीडर राष्ट्रपति भी अपने पास वर्षों से रखे मीडिया के संवैधानिक चेहरे के मामले पर तुरन्त फैसला ले | यह मामला अब सैनिकों व आम लोगों की मौतों से ज्यादा पूरे भारत राष्ट्र की स्वतन्त्रता को खतरे मे डालने वाला व संविधान और लोकतन्त्र को भी मटियामेट करने वाला हो गया हैं |
शैलेन्द्र कुमार बिराणी
युवा वैज्ञानिक
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