आज का भगवद चिंतन-,मैं जो कहा रघुवीर कृपाला
एक वकील बड़े प्रभावी आदमी थे। सो एक आदमी गया कि हम तलाक लेना चाहते हैं। तो तलाक के लिए आवश्यक शर्त क्या हैं ? वकील बोला— शादी। पहले शादी तो हो, तब तो तलाक लोगे, अब शादी ही नहीं तो तलाक क्या ? कुछ लोग सोचते हैं, छोड़ें तब, पहले मिले तो। सब तजि भजन करौं दिन राती।
भगवान हंँस कर बोले– ठीक हैं, ठीक हैं। हमारे यहां सगुन विचारने की परम्परा हैं। कहते हैं– बायां हाथ फड़के तो यह सगुन, दायां हाथ फड़के तो यह। जो कुछ भी हैं, लेकिन मैं केवल इतनी सी बात कहता हूं कि राम जी की दोनों भुजाएं फड़कीं।
सुनि सेवक दुख दीनदयाला।
फरक उठीं द्वय भुजा विसाला॥
दोनों भुजाएं फड़कीं, इसका अर्थ यह था कि अनुकूलता ही अनुकूलता नहीं, कुछ अनुकूलता होगी और कुछ प्रतिकूलता भी होगी। यह फिट भी बैठेगा और नहीं फिट भी बैठेगा। तो आप देखो सुग्रीव बदले कि नहीं ? लेकिन फिर देखो।
भगवान ने कहा कि जाओ, बालि से लड़ो जाकर। बालि को ललकारा, बालि आया गदा लेकर। राम जी देख रहे थे, कुछ नहीं बोले। बालि ने सोचा– सुग्रीव की यह हिम्मत, हमें ललकारे। जरा देखना! यह वही सुग्रीव हैं कि दूसरा बदल कर आया हैं ?
बालि ने एक मुक्के का प्रहार किया।
तब सुग्रीव विकल हुइ भागा।
मुष्टि प्रहार वज्र सम लागा॥
मुक्का लगा, भागा। दौड़ता हुआ आया, महाराज! आपने मरवा डाला, हमने इसीलिए कहा था कि आपके बस का नहीं हैं। वह तो हम अपनी कला से बच गये, भागने की कला में निपुण हैं, सो बच गए। नहीं आपने तो कोई कसर रखी नहीं। आप तो देख रहे थे, क्यों नहीं बाण मारा ?
अब राम जी ने और अद्भुत बात की। व्यंग्य देखो! भगवान की व्यंग्य की शैली कितनी सुंदर हैं ? कहने लगे– भैया सुग्रीव! हम बाण तो मार देते, लेकिन भ्रम हो गया।
एक रूप तुम भ्राता दोऊ।
तेहि भ्रम में नहिं मारेउ तोऊ॥
एक जैसे हो तुम दोनों, उस भ्रम से नहीं मारा। मुझे भ्रम हो गया। सुग्रीव हाथ जोड़कर बोले– प्रभु! काहे को व्यंग्य करते हो ? आपको और भ्रम हो सकता हैं ? भगवान मुस्कुरा कर बोले– सुग्रीव! जब तुम जैसों को ज्ञान हो सकता हैं, तो हमें भ्रम भी नहीं हो सकता ? तुम्हें तो इतना ज्ञान हो गया था कि सब सपना हैं, सब सपना हैं। अब कहाँ गया वह सपना ? इसका मतलब हैं तुम ज्ञानियों की भाषा बोलते हो, पर तुम ज्ञानी हो नहीं। ज्ञान की स्थिति नहीं हैं। अब कौन लग रहा हैं बालि तुम्हें, परम हितैषी ? ••••••नहीं महाराज!
मैं जो कहा रघुवीर कृपाला।
वंधु न होय मोर यह काला॥
यह मेरा काल हैं।चलो! भगवान ने कहा— अब जाओ! परिस्थितियां ठीक हुईं। सुग्रीव को राजा भी बना दिया। भगवान ने कहा– अंगद को युवराज बनाया। सुग्रीव! अंगद के सहित राज्य करना, पर उस कार्य को याद रखना, जिसके लिए जन्म हुआ हैं, या हम तुम्हारे पास आये हैं।••••••• हाँ हमें याद हैं, याद हैं।
याद क्या हैं ? छ: महीने रहे भगवान प्रवर्षण पर्वत पर, सुग्रीव एक दिन पूछने नहीं गये कि हाल चाल ठीक-ठाक हैं कि नहीं ? न पूछने जाते, किसी को भेज कर पुछवाते। अंत में राम जी को कहना पड़ा—
सुग्रीवहु सुधि मोहि बिसारी।
बाधाएं देखो! आप एक बाधा की बात करते हो, कितनी बाधाएँ हैं ? जिनके लिए कलंक कहा भगवान ने बालि को मारकर, और उसी ने भगवान को भुला दिया। बड़ा क्रोध आया, मार डालूंगा उसको। मेरे पास बाण हैं, जिससे बालि को मारा हैं।
लक्ष्मण जी हँसे कि चलो खुशी इस बात की, कि आपको क्रोध आया तो, आता ही नहीं था। लेकिन आप मार डालेंगे ? •••••हाँ, जरुर। बोले— कब मारेंगे ? कहा— कल। लक्ष्मण जी बोले– इसीलिए तो हँसी आ रही हैं, क्रोध आज आ रहा हैं, मारेंगे कल। कहो तो हम आज ही मार आयें, कल का काम आज ही कर आयें ?
भगवान ने समझाया— मारना नहीं, डरा देना। पर उतना ही डराना कि भाग न जाय, यहाँ आ जाय।
डर दिखाय लै आवहु
तात सखा सुग्रीव।
उसके बाद जब सुग्रीव आये। तो मानना चाहिए था कि हमसे गलती हो गई। क्या बोले ? बोले— हमारी कोई गलती नहीं। ••••••फिर गलती किसकी ? •••••गलती! महाराज कह दें सही बात किसकी गलती ? ••••कहो।
आपकी माया की। आपने माया ही ऐसी बना दी–
अतिसय देव प्रवल तव माया।
जेहि न मोह अस को जग जाया॥
लक्ष्मण जी बोले– यह विचित्र आदमी हैं, इसकी प्रवचन की आदत नहीं जाती। पहले भी बातें कर रहा था, अब फिर बातें कर रहा हैं। अब फिर माया, कहीं कुछ। भगवान ने कहा– कोई बात नहीं, आ तो जाता हैं। भूलता तो हैं, लेकिन फिर भी आ जाता हैं।
इसका अर्थ हैं, परिस्थिति को दो दृष्टियों से देखना। इतनी प्रतिकूलता नहीं, जितनी अनुकूलता हैं, उतना देखो। अच्छा मैं आपको बताऊँ , सकारात्मक दृष्टिकोण होना चाहिए। अब कई मेघावी इतने, बड़े-बड़े माननीय महापुरुषों के चरित्रों की भी जरा सी बात कहीं पकड़ लेंगे, तो फिर उसी का खंडन करने लगेंगे। तुम जिन्हें इतना मानते हो। ••••क्या ? बोले– दो कौड़ी के। लोग कहते हैं सही कह रहे हैं, कुछ सही नहीं कह रहे हैं।
एक सज्जन हमें मिले। कहने लगे– आप युधिष्ठिर को धर्मराज कहते हैं ? और उन्होंने ऐसे कहा, जैसे बड़ा क्रोध करके आये हों। तो हमने कहा– कहते क्या, युधिष्ठिर धर्मराज हैं।
बोले– ये धर्मराज हैं, धर्मात्मा तक नहीं, और धर्मात्मा तो जाने दो, हम इन्हें अच्छा आदमी तक नहीं कहेंगे। हमने कहा– क्यों ? बोले— किस काम का आदमी, जो जुआ खेले, और जुआ ही नहीं खेले, पत्नी को दांव पर लगा दे जुये में। उनको आप धर्मराज कहते हो।
*🛕🛕 जय सीताराम जी 🛕🛕*
